दोस्ती – तेरी मेरी गोष्ठी …

दोस्ती – तेरी मेरी गोष्ठी …

दोस्ती,
अक्सर है मुझसे पूछती,
कानों में मेरे गूंजती,
पहेलियाँ ये मुझसे बुझती ।

क्या मेरा होता खास दिवस ?
साल में एक दिन सकूं क्या सज ?
क्या मेरी औकात सिर्फ़ दो गज ?
क्या मात्र औपचारिकता हूँ अब बस ?

क्या नाम मात्र है मेरी पहचान ?
कलयुग क्यूँ यूं हुआ अंजान ?
मुझसे तो पहले थी शान,
अब मेरी कीमत फ़क़त दो थान ?

हो रही थी वो बहुत परेशान,
उसके प्रश्न ना थे आसान,
मन में चल रहे थे घमासान,
क्या बदल गया अब है इंसान ?

सोचा उसको कुछ समझाऊं,
झूठ बोलकर तो फुसलाऊँ,
उसके थोड़े क़रीब मैं आऊं,
अपनी बाहें मैं फैलाऊँ ।

वो ना मगर मुझसे थी मानी,
सच सुनने की उसने ठानी,
बोली – मत तुम गड़ो कहानी,
जो सच है बतलाओ जानी ।

मैंने कहा – तुम ठीक हो समझी,
अब दोस्ती कुछ गई है थम सी,
जो पहले भरते थे दम जी,
अब पीछे हट गए हैं वे भी ।

अब दोस्ती फेसबुक पे है होती,
अब ना तुम केवल इकलौती,
तुनको निभाना अब एक चुनौती,
छल कपट अब देते फिरौती ।

चकाचोंध और झूठी शान,
अब हो गए हैं सिर पे सवार,
अब केवल बचे हथियार,
बीते वक़्त की चीज़ है प्यार ।

आंखों में मेरे पानी था,
बिल्कुल साफ़ आसमानी था,
उसका चेहरा भी रूमानी था,
मैं उसका, वो मेरा सानी था ।

हम दोनों उम्मीद एक दूजे की,
समझते परस्पर बिन पूछे ही,
मिल जाते हैं बिन खोजे ही,
दीवार मजबूत भरोसे की ।

माना हम थोड़े पिछड़े हैं,
इंस्टाग्राम पे नहीं मिले है,
पर ना शिकवे, ना गिले हैं,
ज़रूरतों के भी नहीं क़िले हैं ।

हम आपस में बहुत हैं खुश,
तृप्त हैं, मग्न हैं, और संतुष्ट,
ना कोई होड़, ना ही अंकुश,
कृपा कि मिला है सबकुछ ।

दोस्त ना बाँधो दिनों में,
ऐसे नहीं गिन सकोगे,
ये ना नपते रिश्तों में,
लिपटे हुए हैं फरिश्तों में ।

अभियव्यक्ति – अभिनव ✍🏻

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