२००० का नोट – “धोखा”, “स्कैम” या “होशियारी”

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२००० का नोट – “धोखा”, “स्कैम” या “होशियारी”

सरकार ने जो विमुद्रीकरण का कड़ा कदम उठाया है उसकी चारो और प्रशंसा हो रही है । भारत ही नहीं विदेशो में भी इस पर चर्चा हो रही है । कई देश अब इस पर विचार कर रहे है की उन्हें भी इस तरह के कदम उठाने चाहिए ।

पर हमारे देश में राजनीति और विरोध एक साथ चलते है । तो जैसे ही विमुद्रीकरण की ख़बर आई कुछ नेता जैसे ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी इस पर सरकार के खिलाफ होते दिखे । देखा जाये तो भाजपा को छोड़कर लगभग सारे दल विमुद्रीकरण को वापस लेने के लिए बोल चुके है । कुछ बुद्धिजीवी और पत्रकार भी इसमें खामिया दिखाते नहीं थकते ।

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अब इन नेताओ को और पत्रकारों को जनता की कितनी फ़िक्र है और खुद की कितनी ये जनता जानती समझती ही होगी |

वैसे देश का एक वर्ग जो कानून को ताक पर रखता था वह काफी दुखी है । काली कमाई वाले और टैक्स चोर बड़े परेशान से है । विमुद्रीकरण का विरोध करने वाले नेता एवं पत्रकार ही कला धन रखने वालो की आख़िरी उम्मीद है ।

रोज एक नई कहानी आ रही है । कोई कहता है की अम्बानी के लिए किया गया है तो कोई इसे विजय मालया से जोड़ रहा है। मुझे आश्चर्य इस बात का है की आम आदमी जिसकी समझ अर्थव्यवस्था में शायद थोड़ी कम हो ऐसी बात करे तो समझ में आती है पर पत्रकार जो खुद को बुद्धिजीवी कहते है वे भी ऐसी बात कर रहे है ।

खेर इन मुद्दों पर मैं कभी और लिखने का प्रयास करूँगा। पर अभी इस बात को समझते है की जब विमुद्रीकरण करना ही था तो १००० का नोट बंद करके २००० का क्यों लाये? क्या इससे “ब्लैक मनी” में बढ़ावा नहीं होगा?

इसका जवाब नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने NDTV के एक इंटरव्यू में दिया । उसको सरल भाषा में मैं बताने का प्रयास करता हूँ|

पहला यह है की २००० के नोट की आवश्यकता इन्फ्लेशन याने बढ़ती हुई महँगाई को देखते हुए जरुरी है । मेरा मनना है की २००० के नोट का भी विमुद्रीकरण होना चाहिए पर अभी हम पूरी तरह से तैयार नहीं है । शायद कुछ साल बाद इस पर कोई कदम उठाया जाये । १०० और ५०० के नोट महँगाई को देखते हुए बड़े नहीं लगते ।

दूध का जला छाछ भी फ़ूक फ़ूक कर पीता है । कालाधन कॅश में रखने वाले लोग अब वापस कॅश अपने पास रखने का जोखिम नहीं उठाएंगे । अब हम कम से कम कुछ सालो के लिए इस मामले में बेफिक्र हो सकते है ।

रही बात १००० का नोट हटा कर २००० के नोट की तो इसके पीछे सरकार की बड़ी समझदारी है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझते है ।

मान लीजिये मेरे पास काला धन है । जैसे ही सरकार ने नोटबंदी की मैं अगले दिन बैंक जा कर १०००० रूपये जमा कर देता हूँ (१००० के दस नोट)। मैं बैंक को कहता हूँ की ये मेरा काला धन है और उस पर पेनल्टी भी भर देता हूँ (वैसे ये डिक्लेअर नहीं किया तो भी ये “स्कीम” काम करती क्योंकि १०००० बहुत बड़ी रकम नहीं है)।

अब यह पैसा जुरमाना भरने के बाद व्हाइट मनी हो गया ।

व्हाइट मनी होते ही मैं बैंक से उसी दिन १०००० का कॅश (नए नोट में ) लेकर घर आ जाता हूँ ।

अगले दिन मैं बैंक में जाता हूँ और कहता हूँ की मुझे अपनी “व्हाइट मनी” को जमा करना है । चूँकि में एक दिन पहले ही टैक्स भर चूका हूँ बैंक मुझे अपना पैसा बिना टैक्स के भरने देती है ।

पर ये जो पैसा मैं दूसरे दिन जमा कर रहा हूँ यह नए नोट नहीं बल्कि पुराने नोट (जो मेरे काले धन का हिस्सा है ) से कर रहा हूँ| बैंक को कह रहा हूँ की यह कल के नोट है और चूँकि बैंक एक एक नोट को जांच नहीं करती वह ये बात मान लेगी ।

फिर में एटीएम या दूसरे कॅश काउंटर या दूसरी ब्रांच से नए १००० के नोट निकाल लेता हूँ| अगले दिन मैं फिर बैंक जाता हूँ और यह सिलसिला रोज चलता रहता है | तो में सिर्फ एक बार १०००० के नोट पर टैक्स और जुरमाना भरता हूँ और सारे ब्लैक मनी को व्हाइट बना लेता हूँ |

पर चूँकि अब नोट ही बदल गए है मैं यह “खेल” नहीं खेल सकता। निचे आप इस विडियो को देख सकते है ।

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