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अजय महिया छद्म रचनाएँ – 8

हमें जिनसे मोहब्बत हैं,वो अपनी रजाई लेकर आराम से सोए हैं |एक रात जगकर वो भी देखते, हम उनके लिए कितना रोए हैं || अजय महिया जा,छोड़ दिया हमने तेरी बेवफा गलियों से गुज़रना |तुम्हे भी कोई ओर मिल जाएगा,हमे भी कोई ओर || अजय महिया मेरी

मेरी प्यारी बेटी

मेरी प्यारी बेटीनन्हे -नन्हे पग रखकर,जब चलती गुड़िया प्यारी।मुस्कान तेरी ऐसी,कि मैं बलिहारी जाऊं।नन्हे हाथों में,जो कोमल सा एहसास।पापा की परी,मां की दुलारी।मेरी गुड़िया प्यारी।होठों पर बोल तोतले,मुस्कान ये प्यारी सी।इन पर लुटा दूं

ज्ञान का प्रकाश

ज्ञान का प्रकाश मिट जाए सारा अंधकार,दीपक तुम यदि बन जाओ । शिक्षा का प्रकाश फैलाव,मिट जाए सारा अज्ञान । हर जीवन हो सूरज चंदा ,चमके ऐसे कि सारा ब्रह्मांड । धर्म के नाम मत बांटो,मानवता ही सर्वोपरि धर्म रहे । शिक्षा से ही खिलते

मां तेरी याद आई

मां तेरी याद आई मां तुम खुशी का सागर,प्रेम की मूरत हो। दया प्रेम निस्वार्थ भावना,तेरे आंचल में समाया । सिर पर सदा बना रहे,तेरे प्रेम का हाथ। तेरी आवाज सुन ,मन में प्रसन्नता होते हैं। तेरे मेरे मन के तार ऐसे जुड़े,कि मैं याद

सगी नहीं परायी ही सही

सगी नहीं परायी ही सही ,काश कोई मेरी भी बहन होती !! हर बात पर चिढ़ती, हर बात पर मुझे चिढ़ाती,हर छोटी बात को बिन बात के बड़ा बनाती !मेरी हर छोटी गलती पर मुझे माँ से बचाती,कभी कभी तो बिन बात के ही डांट खिलाती !!सगी नहीं परायी ही सही ,काश कोई

!! तू कहे !!

!! तू कहे !! तू कहे तो तेरे पल्लू का आंचल चुरा लू ,तू कहे तो तेरे नयनो काजल चुरा लू ,तू कहे तो तेरे कानो से बाली चुरा लू ,तू कहे तो तेरे होठों से लाली चुरा लू !! तू कहे तो मैं बारिश रुका दू,तू कहे तो मैं बिजली गिरा दू,मान लो मेरी

विरह के दीप – कविता

खुशियों के दीप जलें हैं तुम पर हरिताभा-सी छाई है |विरहिणी की दीवार पर विरहाग्नि-सी लौट आई है ||किससे और क्यों कहें ? इस दिले चमन की दास्तां |हमने तो हर दिन और रात विरह के दीप जलाए हैं ||

दिल का ठिकाना – कविता – शशिधर तिवारी

जिसके लिए था, मुझे काजल कमाना,उसने ही बदल दिया "दिल का ठिकाना" !!! तेरे लिए तो मैं झुका देता सारा जमाना,तू ही तो थी मेरी हर खुशियों का खजाना !!तेरे साथ ही तो था मुझे घर बसाना,आज पड़ रहा है तेरी ही डोली सजाना !!जिसके लिए था, मुझे काजल

मैंने देखा – कविता – शुभम शर्मा ‘शंख्यधार’

मैंने देखामैंने देखा पंछी को और तिनके तिनके को लानावो धूप के दामन में भी तिनके से नीड़ बनानादेखी है चमक आंख की और चेहरे का मुस्कानावो छूने से तलवे कोमल बच्चों का खिल खिल जाना। मैंने देखा नमी आंख को और देखी सिकन पुरानीमैंने आंख का पानी

रावण – छद्म रचनाये – अभिनव कुमार

काश कि कुछ ऐसा हो जाए,रावण को सद्बुद्धि आ जाए,ख़ुद भी जिए, जीने दे दूजा,ज्ञान को सही दिशा चलाए lअभिनव कुमार रावण को जलाने वालों,तुम क्यों रावण बन गए?अब तो ज़िद छोड़दो अपनी,अच्छे अच्छे बदल गए lअभिनव कुमार

चलो कुछ बातें करते हैं

चलो कुछ बातें करते हैं चलो कुछ बातें करते हैं….चलो कुछ बातें करते हैं…. छोटी सी दुनिया, ख्वाब छोटे हमारेछोटे से मीठे से किस्से हमारेछोटी सी मुस्कान धरते हैं…चलो कुछ बातें करते हैं….. छोटा है जीवन पर बड़े इरादेदूरी है ज्यादा पर

सनम बताओ ना !!

सनम बताओ ना !! मैं खुद को अलग नहीं समझता तुम सेतुम समझती हो ऐसा.. तो बताओ नालगता है कि सदियों से नहीं देखा तुम्हेंआज बाल सुखाने फिर छत पे आओ ना कभी आंगन को, तो कभी… छज्जे को निहारूं तेरेएक झलक दे दो… बाज़ार तक घूम आओ नातुमने छोड़

मैं तेरा ही हूँ मगर,
तेरा हो सकता नहीं

मैं तेरा ही हूँ मगर,तेरा हो सकता नहीं !! हाथ मेहंदी का था, जब मेरे हाथ में,नजर झुकी थी मगर, कोई इशारा नहीं !तुम तो सजती हो लेकर के अंगड़ाइयां,बनकर जाओ दुल्हन ये गंवारा नहीं !! मैं तेरा ही हूँ मगर,तेरा हो सकता नहीं !! याद आती है

किंकर्तव्यविमूढ़ – कविता- ईश शाह

जब मैं कुछ नहीं करता हूँतब मुझे दोषी करार दिया जाता है।जब कुछ करूँ तो फिर मेरा क्या हश्र होगा?मैं डरता हूँ नजरों के अंधियारो सेडरता हूँ शब्दों की तलवारो सेसहमा हूँ रिश्तों के बटवारे मेंपला हूँ आँसुओ की आँखों मेंचार आँखे वाले मेरे जीवन के

किताबें बोलती है

किताबें बोलती है सुना है मैने किताबें है बोलती हैंसबको राह दिखाती हैहर एक विषय में बतलाती है,मीठी बाते ताजा खबरें सामान्य ज्ञान बतलाती हैसबको एक ज्ञान बतलाती है ,हिंदी हो या चाहे अंग्रेजी सबको समान रूप में बतलाती है,सुनो जो भैया इनकी तो

आवाहन :( निर्गुण)

आवाहन :( निर्गुण) ठाढ़ी झरबेरिया वन में होत मिन सार बा कैसे जाऊँ पार पियरा नदिया के पार बा। भोरी मतवारी तन की अब लगि कुआरि हूँ। सगरौँ सिंगार कइली लागेला उघारि हूँ। वहि पार.. पी. घर... यहि पार संसार बा। कैसे जाऊँ

शुभम शर्मा ‘शंख्यधार’ – छद्म रचनाए – 1

वो चंद पल बदल बैठे मेरे ईमान का चेहराखड़े थे साथ सब अपने मगर था धुंध का पहराहटा जब वो समा कातिल हुआ दीदार जन्नत काखड़ा था आसमां पर मैं था सर पर जुर्म का पहराशुभम शर्मा 'शंख्यधार' क्यों काली रातों में ही तुम मिलने आते होक्यों फटे हुए

“छ: वाणी”

"छ: वाणी" छ: बोले कोई सुनो हमारीभाड़ में जाए दुनिया सारी गोल गोल लोग मुझे घुमातेउल्टा लटकाकर नौ बतातेक्रिकेट में मुझको सिक्स बतातेविक्स एड में मुझे दिखाते। घड़ी है जब भी छ: बजाएदोनों सुइयां सीध पे आएंडूब तब झटपट सूरज जाएकाम छोड़

वो नाराज़ हैं!

वो नाराज़ हैं! मैंने खुद ही खुदको तोड़करअपने रास्ते में कांटे बिछाए हैं,मुझे गिला नहीं है गैरों सेमैंने खुदही खुदसे धोखे खाए हैं। वो देखते हैं तिरछी नजर से मुझे इसमें मेरा क्या कसूर,शायद उन्होंने ऐसे ही हमसे मिलने के गुर अपनाए हैं।
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