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poem

सनम बताओ ना !!

सनम बताओ ना !! मैं खुद को अलग नहीं समझता तुम सेतुम समझती हो ऐसा.. तो बताओ नालगता है कि सदियों से नहीं देखा तुम्हेंआज बाल सुखाने फिर छत पे आओ ना कभी आंगन को, तो कभी… छज्जे को निहारूं तेरेएक झलक दे दो… बाज़ार तक घूम आओ नातुमने छोड़

मैं तेरा ही हूँ मगर,
तेरा हो सकता नहीं

मैं तेरा ही हूँ मगर,तेरा हो सकता नहीं !! हाथ मेहंदी का था, जब मेरे हाथ में,नजर झुकी थी मगर, कोई इशारा नहीं !तुम तो सजती हो लेकर के अंगड़ाइयां,बनकर जाओ दुल्हन ये गंवारा नहीं !! मैं तेरा ही हूँ मगर,तेरा हो सकता नहीं !! याद आती है

किंकर्तव्यविमूढ़ – कविता- ईश शाह

जब मैं कुछ नहीं करता हूँतब मुझे दोषी करार दिया जाता है।जब कुछ करूँ तो फिर मेरा क्या हश्र होगा?मैं डरता हूँ नजरों के अंधियारो सेडरता हूँ शब्दों की तलवारो सेसहमा हूँ रिश्तों के बटवारे मेंपला हूँ आँसुओ की आँखों मेंचार आँखे वाले मेरे जीवन के

किताबें बोलती है

किताबें बोलती है सुना है मैने किताबें है बोलती हैंसबको राह दिखाती हैहर एक विषय में बतलाती है,मीठी बाते ताजा खबरें सामान्य ज्ञान बतलाती हैसबको एक ज्ञान बतलाती है ,हिंदी हो या चाहे अंग्रेजी सबको समान रूप में बतलाती है,सुनो जो भैया इनकी तो

आवाहन :( निर्गुण)

आवाहन :( निर्गुण) ठाढ़ी झरबेरिया वन में होत मिन सार बा कैसे जाऊँ पार पियरा नदिया के पार बा। भोरी मतवारी तन की अब लगि कुआरि हूँ। सगरौँ सिंगार कइली लागेला उघारि हूँ। वहि पार.. पी. घर... यहि पार संसार बा। कैसे जाऊँ

शुभम शर्मा ‘शंख्यधार’ – छद्म रचनाए – 1

वो चंद पल बदल बैठे मेरे ईमान का चेहराखड़े थे साथ सब अपने मगर था धुंध का पहराहटा जब वो समा कातिल हुआ दीदार जन्नत काखड़ा था आसमां पर मैं था सर पर जुर्म का पहराशुभम शर्मा 'शंख्यधार' क्यों काली रातों में ही तुम मिलने आते होक्यों फटे हुए

“छ: वाणी”

"छ: वाणी" छ: बोले कोई सुनो हमारीभाड़ में जाए दुनिया सारी गोल गोल लोग मुझे घुमातेउल्टा लटकाकर नौ बतातेक्रिकेट में मुझको सिक्स बतातेविक्स एड में मुझे दिखाते। घड़ी है जब भी छ: बजाएदोनों सुइयां सीध पे आएंडूब तब झटपट सूरज जाएकाम छोड़

वो नाराज़ हैं!

वो नाराज़ हैं! मैंने खुद ही खुदको तोड़करअपने रास्ते में कांटे बिछाए हैं,मुझे गिला नहीं है गैरों सेमैंने खुदही खुदसे धोखे खाए हैं। वो देखते हैं तिरछी नजर से मुझे इसमें मेरा क्या कसूर,शायद उन्होंने ऐसे ही हमसे मिलने के गुर अपनाए हैं।

कविता -मै‌ लक्ष्मी दो आँगन की

कविता -मै‌ लक्ष्मी दो आँगन की बेटी बन आई हूं मै जिस‌ आशियाने के आँगन में ।बसेरा होगा कल किसी और घर के आँगन में ।। क्यों चलाई ये रीत,खुदा तेरे इन साहसी बन्दों ने ।आज़ नहीं तो कल पराई कर दी तेरे अदीबों ने ।। जन्म हूआ तब, ना बंटी

जीवन या कहर

जीवन या कहर ये काली घटा कांटों का महलये जीवन है या कोई कहरटूटा है बनके पहरा यूंजैसे पी लिया हो कोई जहर क्यों मंदम हवा है वहकी सीऔर वीरानगी भी चहेंकी सीपीतल का निकला हर वो महलजिसे सोचा स्वर्ण महल हमने कहीं दूर से आती एक आवाज़जहां

राही – अक्षी त्रिवेदी

नूर का लुत्फ़ उठा रहा राही,कहीं उसका आदी न हो जाए,चंचल किरने कर रही सामना,कहीं वक़्त से मुलाक़ात न हों जाए। सत्य की गंगा बहते बहते, कहीं मन का अकस न दिखा जाए,हो रहा कड़वे सच से सामना,कही ज़हन में ज़हर न भर जाए। चाँद को देख मन हो

युद्ध हो रहा है

युद्ध हो रहा है सूरत-ए-हाल दुनिया का ये क्या हो रहा है लौमड़ भर रहा तिजोरी और जोकर रो रहा है  जंग-ए -वतन में आम आदमी पिस रहा है अहम के सिलबट्टे पर राजा सेना को घिस रहा है  जो था कल तक महापंच सबका वही आज घर-घर जाकर जूते घिस रहा है  किस

रवि – कविता -अक्षी त्रिवेदी

रवि शब्दों से रचा हुआ खेल कभी,कहाँ किसिको समझ में आया हैं,दूर से सब देख रहा वो,पर कभी क्या समझाने आया हैं? मन से विचलित होकर वो भी,कहीं अपनी काया काली न कर जाए,देख रहा है वो तो कलयुग,कहीं इसका दर्शक न बन जाए। डर लग रहा बस इसी बात

कलम – कविता – वंदना जैन

कलमशब्द कम पड़ जाते हैंजब प्रेम उमड़ता है ढेर साराप्रियतम तक पहुचना चाह्ती है कलम दिल के हर जज्बात छोटी-बडी बातेंबातों मे मुलाकातेमुलाकतों मे बरसती बरसातेंदिन के एकाकी लम्हे सांझ की कुम्ह्लायी उदासीरातो मे जागती आखेंसपनों मे मिलन के

भिन्न भिन्न चेहरे 

भिन्न भिन्न चेहरे  अलग-अलग रंग औरअलग-अलग रूप के बहार से नहीं अंदर के ये चेहरे कोई है डरे सहमे,कोई खिले-खिले से चेहरे माँ जैसे परेशां,पिता जैसे क्रोधितबच्चों से बेफिक्र चेहरे संस्कारों में पले समय से

प्रेम एक स्वछंद धारा

प्रेम एक स्वछंद धारा एक प्रेम भरी दृष्टि और दो मीठे स्नेहिल बोलों से बना सम्पूर्ण भ्रह्मांड सा प्रेम कैसे समाएगा मिलन और बिछुड़न के छोटे से गांव में जहाँ खड़े रहते हैं अभिलाषाओं और अपेक्षाओं के

माँ – कविता – वंदना जैन

“माँ” मैं हूँ हिस्सा तुम्हारा और रहूंगी सदा छाया तुम्हारी  आज दूर हूँ तुमसे पर हर पल मन में है छवि तुम्हारी                   अपनी मुस्कानों की तुमने सदा की मुझ पर स्नेह वर्षा स्वयं को रखा पीछे और आगे रही ढाल तुम्हारी  अपना निवाला छोड़ा

तेरे शहर में आने का दिल करता है बार बार

तेरे शहर में आने का दिल करता है बार बार...मैं ढूँढता हूँ बार बार, तुझे देखने के बहाने हजार,  अब तो तुझसे मिलने को, ये निगाहे हैं बेक़रार, तेरे बिना जिंदगी की हर तमन्ना है अधूरी,  अब तुझसे मिलकर मिटानी है ये दूरी...तेरे शहर में आने

तुम्हारा संदेसा आया

(तुम्हारा संदेसा आया) मेरे गीतों के स्वर तुमसे सजे हैं “प्रिय”दिन-रात कानों में गूँजें हैं कभी मौन ,कभी पायल पहन थिरकते हुए छम-छम बजे हैं शब्दों ने भी क्या माला बनाई नित जुड़ कर
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