अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 3

मैं सबकी नज़रों में गिर गया हूँ,
कोसा गया हूँ – जिधर गया हूँ,
जुड़ा ही कब था कि बिखर गया हूँ,
कुछ भी हो, मैं डर गया हूँ ।

अभिनव कुमार – Jan 21

मन की बात,
करूँ किसके साथ,
हैं भरे पड़े,
कितने ज़ज्बात !

हो रही घुटन,
भटके तन मन,
अन्दर ही अन्दर,
हो रहा दफन

अभिनव कुमार – Jan 21

यही दुआ इस साल,
रहो खुश हर हाल,,
चल रही हैं साँसें,,,
ये ही सौगात I

अभिनव कुमार – Jan 21

गहराई …
समझो तो जन्नत पाई …

न मन्दिर गया, न मस्जिद गया,
मैं “भीतर” गया,
मैं “भी तर” गया ।

न मरकर जिया,
मैं “जीकर” जिया,
कि मेरा भी था “जी कर” गया ।

“अभि” की कलम से ✍🏻

अभिनव कुमार – Dec 20

मुझको भला बुरा कहने वालों,

ज़रा आईना भी तो देखलो,,

मुझसे नाराज़ रहने वालों,,,

ज़रा ख़ुद से भी कुछ सीख लो ।


माना जल बिन आकार,

मन माफ़िक लो इसको ढाल,,

जो दुरुपयोग तो हो विकराल,,,

फ़िर तांडव और बस हाहाकार ।

अभिनव कुमार – Nov 20

रिश्ते कितने ही ज़्यादा गुंजल हो गए,
ये देख हम जीते जी पागल हो गए,,
कोशिश की सुलझाने की तो,,,
ना जाने कहाँ कहाँ पर दंगल हो गए !

अभिनव कुमार – Nov 20

मैं गलत, मैं गलत,
हाँ भाई, मैं ही गलत,,
मैं गलत हूँ सौ प्रतिशत,,,
लो गलतफहमियां भी हैं सहमत ।

अभिनव कुमार – Nov 20

मज़ाक लिया गया मुझे दशकों से,
कहा गया “करो नज़रअंदाज़”,,
जल को तोला गया मेरे अश्क़ों से,,,
उसी से चलवाए पानी के जहाज़ ।

अभिनव कुमार – Nov 20

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