।। समझ बैठे ।। कविता || शशिधर तिवारी ‘ राजकुमार ‘

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।। समझ बैठे ।।

तेरी सारी ख्वाहिशों को ,

हम हमारी रहमत समझ बैठे।

तेरी होंठो की मुसकुराहट को ,

तो हम हमारी चाहत समझ बैठे ।

तेरी ज़ुल्फो की घटाओ को ,

हम हमारी अमानत समझ बैठे ।

तेरी नयनों की पलकों को ,

तो हम हमारी इबादत समझ बैठे ।

तेरी कानों की बालियो को ,

हम हमारी जमानत समझ बैठे ।

तेरी झूठी मुहब्बत को ,

हम हमारी जिंदगी समझ बैठे ।

हा गलती हमारी जो तेरे इंतजार को ,

तो हम हमारी इकरार समझ बैठे ।

हा गलती कर दिया हमने ,

सजा दो हमे जो तुम्हे अपना समझ बैठे ।

समझ बैठे , समझ बैठे ,

जो तेरी ख़ामोशीयो को ,

हम तेरा इजहार समझ बैठे ।

जो हम किसी पराए को ,

अपने दिल का ताज समझ बैठे ।

शुक्रगुज़ार हूँ मैं तेरे शब्दों का जिनसे तुने इनकार किया ;

वरना लोगो के बहकावे में ,

हम खुद को खामाखाहि कवि समझ बैठे ।

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