आज़ादी की क़ीमत

आज़ादी की क़ीमत

अगस्त का मास,
आती है याद,
शूरवीरों की,
तप की तस्वीरों की ।

जागता है जज़्बा,
तैयार शहर क़स्बा,
सनक कुछ करने की,
देश पे मर मिटने की ।

उमड़ता है जुनून,
नशा जोश धुन,
देश लगे सर्वप्रथम,
इसमें जैसे जाते रम ।

खाते हैं सौगंध,
माटी की गंध,
हिन्द की ख़ातिर,
तन मन हाज़िर ।

याद आती शहादत,
करे प्राण निछावर,
देश पे कुर्बान हुए,
वे अमर महान हुए ।

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नवरात्रि

चूमी फांसियां,
खाई गोलियां,
वे गए जेल,
थे वे अनमेल ।

कई बार नाक़ाम,
बहुत सहे अपमान,
मगर नहीं रुके,
सिर नहीं झुके ।

ना मानी हार,
पागलपन सवार,
खदेड़कर ही माने,
आज़ादी के दीवाने ।

आख़िरकार,
हम हुए आज़ाद,
जंज़ीरें टूटी,
खुल गई खूंटी ।

खौल उठता खून,
सबकुछ ये सुन,
ज़ाया ना जाएं,
साक्ष्य गाथाएं ।

ये सब किसके लिए ?
तुम्हारे लिए, मेरे लिए !
वे तो चले गए,
स्वतंत्र भारत दे गए ।

ये जैसे अमानत,
करो कद्र हिफाज़त,
ना समझा महत्व,
तो फ़िर बस लानत…
तो फ़िर बस लानत…

अभिव्यक्ति – अभिनव ✍🏻

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