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कविता

लेकिन अधूरे इश्क़ का भी, एक अलग मजा है

लेकिन अधूरे इश्क़ का भी, एक अलग मजा है।

वो साथ में बिताए लम्हे, सभी को याद रहते हैं।
वो टूटे हुवे सारे ख़्वाब, दिल में आबाद रहते हैं।
इश्क़ में दिलबर की बाहों में, कैद हम थे कभी।
दिलबर की उन बाहों से, अब आजाद रहते हैं।

समझ ना आए कि वो सजा थी, या ये सजा है।
लेकिन अधूरे इश्क़ का भी, एक अलग मजा है।

वो लड़ना- झगड़ना और वो मीठी- मीठी तकरार।
कभी रूठकर ना बोलना, कभी मनाने को बेकरार।
पता है हमको वो नहीं आएगी, अब कभी लौटकर।
लेकिन हर वक़्त रहेगा, उसके आने का इंतजार।

लगता है ख़ुदा की, यही ख्वाहिश, यही रजा है।
लेकिन अधूरे इश्क़ का भी, एक अलग मजा है।

हर चेहरे में उसकी, मुस्कुराती सूरत नज़र आती है।
हर पल कानों में, उसकी आवाज सी टकराती है।
जब कभी छूंकर गुजरता है, हवा का झोंका कोई।
लगता है जैसे वो कहीं से, मुझे आकर छूं जाती है।

उसके नाम से हर पल दिल में संगीत बजा है।
लेकिन अधूरे इश्क़ का भी, एक अलग मजा है।

मेरा नाम संदीप कुमार है। मेरी उम्र 34 वर्ष है। मैं उत्तराखंड के नैनीताल में रहता हूँ। कुमाऊँ यूनिवर्सिटी से स्नाकोत्तर किया है। वर्तमान में पत्रकारिता कर रहा हूँ। शायरी, कविता, व्यंग, गज़ल व कहानियां लिखने का बहुत शौक है। इसलिए अपनी सरल बोलचाल की भाषा में…

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