कविता

दौर जाएगा बीत…

दौर जाएगा बीत…

सिर्फ़ इक्कीस दिन,
दे ये पलछिन ।

देदे ये मुझको,
मेरे दर्द को समझो ।

मेरी है ये विनती,
एक सुई के जितनी ।

ज़्यादा नहीं मांगा,
देदे मुझे तू वादा ।

घर में तू बैठ,
ना घूम, ना सैर ।

हो घर में बंद,
वहां बहुत आनंद ।

थोड़ा हो तन्हा,
ये तेरा लम्हा ।

कुछ तो तू थम जा,
ख़ुद में ही रम जा ।

बाहर है विशाणु,
छोटा परमाणु ।

वो जैसे भूत,
किया सब ही अछूत ।

है जैसे सांप,
सब रहे हैं कांप ।

फन है फैलाए,
डर रहे हैं साए ।

सूरज भी चुप है,
बादल में गुम है ।

फ़िर भी है लड़ना,
बिल्कुल ना डरना ।

दुनिया को भूल,
घर में मिल जुल ।

मत बाहर झांक,
लगी हुई है आग ।

थोड़ा रख सब्र,
छंट जाएंगे अब्र ।

गया विश्व है थम,
तू नहीं है कम ।

सब बन गए बुत,
बिन बातें चुप ।

ये लम्हा नाज़ुक,
बन बहरा मूक ।

हर पल ही सचेत,
सावधानी समेत ।

खाले तू कसम,
तुझमें भी दम ।

तेरा इम्हितान,
बचा अपनी जान ।

संघर्ष कर, जीत,
दौर जाएगा बीत…
दौर जाएगा बीत…

स्वरचित – अभिनव

अभिनव कुमार एक साधारण छवि वाले व्यक्ति हैं । वे विधायी कानून में स्नातक हैं और कंपनी सचिव हैं । अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकालकर उन्हें कविताएं लिखने का शौक है या यूं कहें कि जुनून सा है ! सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे इससे तनाव मुक्त महसूस करते…

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