कविता

कहूँ ऋषि कपूर या कोहिनूर

कहूँ ऋषि कपूर,
या कोहिनूर
दोनों समरूप,
बेहद ही खूब । 4

किया नाम सार्थक,
तप था अंत तक,
सब अपने बलबूते पर,
चूम लिया था अंबर । 8

चॉकलेटी छवि,
प्यार की पदवी,
था जैसे रवि,
आकर्षित सभी । 12

निर्माता, निर्देशक,
अभिनेता आकर्षक,
चलता था अनथक,
होते पागल थे दर्शक । 16

मिस्टर चिंटू
ना कोई किंतू,
था चन्द्र बिंदू,
मुस्लिम और हिन्दू । 20

पूत के चरण,
पालने में आए नज़र,
बचपन में दिखी झलक,
भविष्य का कुलदीपक । 24

३ साल से की शुरुआत,
‘श्री 420’ में उदीयमान,
सबके दिलों पर किया राज,
अभिनव अदाकारी, अलग अंदाज़ । 28

पाँच दशक तक चलचित्र,
श्रम प्रयास सफलता मंत्र,
बिखेरा चारों तरफ इत्र,
गज़ब जुनून, आदर्श चरित्र । 32

रोमानी दौर को किया आरंभ,
सिने जगत का था वो स्तम्भ,
किरदार में गुम, करता था दंग,
मनमोजी वो, वो मस्त मलंग । 36

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता,
सारे वर्ग का था चहेता,
हँसता, हँसाता और संजीदा,
मँझा हुआ वो था अभिनेता । 40

थी परिपक्वता,
जैसे घर का बड़ा,
बरगद का पेड़,
हरदम मुस्तैद । 44

ऐसा था काम,
जैसे चारों धाम,
अब पूर्ण विराम,
अब पूर्ण विराम । 48

था इक्का पत्ता,
उसकी थी सत्ता,
ऐसा अभिनेता,
इतिहास रचयिता । 52

माना मिली विरासत,
पर काफ़ी मुशक्कत,
जन्मजात काबिलियत,
अच्छी भी नीयत । 56

वो था गुलदस्ता,
हरदम था हँसता,
गुलशन महकाता,
उसमें रब बसता । 60

था बेहतरीन,
जैसे नई दुलहिन,
वो आफ़रीन,
जैसे पहला दिन । 64

था लाजवाब,
हम सबका ख्वाब,
कितने ही ख़िताब,
वो खुली किताब । 68

ऐसा अदाकार,
था सदाबहार,
यारों का यार,
था भी खुद्दार । 72

अर्जित की शोहरत,
और साथ में दौलत,
माना अच्छी किस्मत,
काफ़ी पर मेहनत । 76

बेहद खूबसूरत,
दिल दया की मूरत,
था छैला सुंदर,
रूप जैसे समुंदर । 80

था एक मिसाल,
उसका ही ख़याल,
चित्त बहुत विशाल,
वो बेमिसाल । 84

था ज़िंदादिल,
वो था खुशदिल,
आभा झिलमिल,
था प्रगतिशील । 88

था सुबह की ओस
भरसक था जोश,
करता मदहोश,
वो था फिरदौस । 92

सच्चा देश भक्त,
वो जैसे दरख़्त,
आतंक पे सख़्त,
जो दिल में – व्यक्त । 96

जनता से की अपील,
एकजुट होकर मिलेगी जीत,
हिन्द का हरपल चाहा हित,
वो बेबाक, वो था पुनीत । 100

दिल लेता था छू,
जैसे कोई ख़ुशबू,
मंत्रमुग्ध देह रूह,
कीर्ति यश आबरू । 104

था जैसे जादूगर,
बड़ा गहरा असर,
छाप छोड़ी अमर,
प्रभाव अक्सर । 108

प्रसन्नचित्त व्यक्तित्व,
ऊर्जा से लिप्त,
संतुष्ट व तृप्त,
गुण अनन्य, ना संक्षिप्त । 112

बहुआयामी जीवंत,
योगी जैसे संत,
मुस्कान सदैव अनंत,
गीता क़ुरान का ग्रंथ । 116

जीवन के कई रूप,
कभी छाँव, कभी धूप,
उतार छड़ाव भरपूर,
चुनोतियाँ मगर मंज़ूर । 120

प्रतिभा अपरामपार,
गलतियाँ स्वीकार,
भावुक इनसान,
अतुलनीय, प्रथम स्थान । 124

दिग्गज कलाकार,
बिलकुल दमदार,
ना मानी कभी हार,
चट्टान दीवार । 128

राजनीति से फासला,
महारत हर एक कला,
मोहब्बत का सिलसिला,
ना कोई मुक़ाबला । 132

असाधारण अभिनय कौशल,
मानवीय रिश्तों का दर्शन,
याद करे हर मन,
नतमस्तक अभिवादन । 136

किंवदंती महानायक,
परिपूर्ण विनायक,
अद्भुत और लायक,
मददगार सहायक । 140

पीढ़ी दर पीढ़ी,
मनोरंजन की सीढ़ी,
उपयुक्त हर शैली,
ख्याति तभी फ़ैली । 144

उम्र का हर पड़ाव,
आया अनुभव व निखार,
निष्ठा थी आधार,
भद्र सभ्य संस्कार । 148

युवा दिलों की धड़कन,
देख झूमता तन बदन,
बेशकीमती आभूषण,
प्रचुर जज़्बा और अगन । 152

ऐसी श्रेष्ठता को नमन,
यथासाध्य थी लगन,
थी रौनक और चमक,
धरा गर्वित और गगन । 156

था आत्मीयता का संबंध,
इंसानियत की गंध,
एक युग का अंत…
एक युग का अंत… 160

स्वरचित – अभिनव ✍🏻
उभरता कवि आपका “अभी”

Image courtesy: Twitter Profile of Rishi Kapoor ji

अभिनव कुमार एक साधारण छवि वाले व्यक्ति हैं । वे विधायी कानून में स्नातक हैं और कंपनी सचिव हैं । अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकालकर उन्हें कविताएं लिखने का शौक है या यूं कहें कि जुनून सा है ! सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे इससे तनाव मुक्त महसूस करते…

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