जय हिंद …

जय हिंद …

सैनिक है बैठा सीमा पर,
सिर्फ़ तेरी मेरी ख़ातिर,
मैं और तू तो हैं घर पर,
वो जैसे एक मुसाफ़िर ।

अपनी तो जान बचाने की,
ना उसको कोई है परवाह,
एक मैं और तू ही लड़ते हैं,
क्या मंदिर, मस्जिद, दरगाह !

सबकुछ तो उसने त्यागा है,
देशभक्ति ना पर त्यागी,
सीने पर गोली खाने को,
वो डरता नहीं ज़रा भी ।

क्यों उसे पड़ी हमारी है,
उसको भी हक़ जीने का,
क्यों मोल नहीं चुकाते हम ?
ऐसे बेशकीमती नगीने का ।

माना हम सरहद पर जाकर,
ना शत्रु से लड़ सकते हैं,
आपस में ना हों झगड़े पर,
इतना तो हम कर सकते ।

सैनिक का बढ़ाएं मनोबल हम,
परिवार का वो हो हिस्सा,
वो असल में शत्रू से लड़ता,
ना कहानी ना ख़याली किस्सा ।

स्वरचित – अभिनव ✍

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