अजय महिया छद्म रचनाएँ – 4

मुझे उनकी दुनियां मे रहना नही है
वफाओं का मंज़र मुझे सहना नही है
तेरे लिए मै और मेरे लिए ही तु है
ओ मां……प्यारी मां……मेरी मां ।।

अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़

मौत तो यूं ही नजदीक आ जाएगी
तब सांसों की डौरी टुट जाएगी ।।
प्यार-मौहाब्बत तो होती ही रहेगी
जब तक इस तन मे जां रहेगी ।।
तुम, मै और पूरी दुनियां सो जाएगी
जब सांसों की डौरी टुट जाएगी ।।

अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़

आ जाओ मिलकर ज़िन्दगी बसर कर लेते हैं ।
तुमसे जूदा होकर तुम्हे‌ बहुत miss करते हैं ।।
क्या पता कितनी बाकी रही है ये जिन्दगी ।
आओ आज एक छोटी-सी मुलाकात करते है ।।

अजय महिया नोहर, हनुमानगढ़

अगर ज़िन्दग़ी को अच्छे से बसर करना है तो भीड़ से दूर चलो ।

अज़य महिया

21 वीं सदी के‌ लोग अपना सबसे महान् काम मानते हैं आपकी‌ कामयाबी के बढते कदमों को अपने कड़वे व असहनीय बातों के‌ तीरों से हर हाल मे रोकना ।

अज़य महिया

महामूर्ख होते‌ हैं ‌वो‌ लोग जो दूसरे की ज़िन्दगी‌‌ पर अपना अधिकार जताते हैं ।

अज़य महिया

यहां‌ लोग‌ सिर्फ‌ तुम्हारी‌ कामयाबी को स्वीकार करते‌ है‌,

कामयाबी‌ की ओर बढते‌ कदमों‌ को कदापि स्वीकार नहीं कर सकते हैं ।

अज़य महिया
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मौत तो यूं ही बदनाम है साहब ,

लोग‌ उसे‌ जान बूझकर गले लगाते हैं।

अज़य महिया

जब दुनियां से अलग रहना सीख लोगे ,

तब आपको अपनी मंजिल नज़दीक दिखेगी अन्यथा नहीं

अज़य महिया

मैंने मौत को देखा तो नहीं
पर शायद वो बहुत खूबसूरत होगी
कमबख्त जो भी उससे मिलता हैं
जीना ही छोड़ देता हैं

अज़य महिया

मेरी ख्वाहिश तुम हो
इश्क़ की फरमाइश तुम हो
ए-ज़िन्दग़ी ग़म के रास्तों की पैदाइश तुम हो

अज़य महिया

लाख कोशिशें कर लो तुम हमसे मिलने की ए-साखी
तुम्हारी क़िस्मत हमसे नाराज़ है ।

अज़य महिया

साखी की नज़र सकार हो,
जो तड़फ रहे है हमे‌ मिलने को
खुदा करे उनकी तड़फ बेशुमार ‌हो

अज़य महिया

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