अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 7

जिसका भी बस चल रहा है,
वो रंग बदल रहा है,
मैंने सोचा “करूँ मैं भी प्रयत्न”,
मुझको मगर बुरा लग रहा है l

अभिनव कुमार

सबसे ऊपर दृढ़-विश्वास,
पर्वत नहीं कहीं आस-पास,
पूर्ण हो जब पर्वतारोहण,
पाँव तले संपूर्ण पहाड़

अभिनव कुमार

किसी से मैं निभा ना पाया,
मुझसे दूर मेरा ही साया,
दूर दराज की बात को छोड़ो,
मैं अपनों से ही हुआ पराया l

अभिनव कुमार

मैं रोया तो नाटक समझा तुमने,
मेरे जज्बातों को घातक समझा तुमने,
एक अच्छे ख़ासे व्यक्ति को पागल कहके,
अपनी तरक्की में बाधक समझा तुमने l

अभिनव कुमार

बताऊं तो बेइज्जती है,
नहीं तो ख़ुद की क्षति है,
क्या करूँ, क्या ना करूँ?
मारी गई जैसे मति है l

अभिनव कुमार

सब कुछ है, मगर कुछ नहीं,
जीवन में शांति बिल्कुल नहीं,
खरीदने के लिए चाहे धन सही,
ना है संतोष, व मूल नहीं l

अभिनव कुमार

रोने के हम आदि हैं,
क्या करें – ‘बेहद जज़्बाती हैं’ !
आपने ये कहके ठुकरा दिया,
कि ‘हम तो निराशावादी हैं’ !

अभिनव कुमार

नाराज़ शीघ्र हो जाता हूँ,
और मुँह भी बहुत बनाता हूँ’,
धन्यवाद इस अभिवादन का,
मैं बोलने से कतराता हूँ ।

अभिनव कुमार

मेरा हर लब्ज़ ‘ज़हर’,
तेरी हर अदा में कहर,
क्या हुई खता मुझसे ?
यही सोचता हूँ आठों पहर ।

अभिनव कुमार

कोई दोस्त बना ना पाया,
ख़ुद को ही दोस्त बना लेता,
रूह से देह का संगम,
उसको दिल से अपना लेता ।

अभिनव कुमार

ज़माना नहीं देखना अब,
अपने ही बस काफ़ी हैं,
कैसी भी, कोई, बात कहो,
लगा देते फांसी हैं ।

अभिनव कुमार

मुझे पता है,
तुम्हें बहुत गिले हैं मुझसे !
अभी तक जो तुम,
नहीं मिले हो मुझसे !

अभिनव कुमार

जवाब ना आए गर हमारा,
ये मत समझना “याद नहीं करते तुम्हें”,
हम मशरूफ़ हैं उलझनों में अभी,
रहते हैं अक़्सर बुझे बुझे । ✍🏻

अभिनव कुमार

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