मज़दूर नहीं, वो है मजबूर

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मज़दूर नहीं, वो है मजबूर

मज़दूर यानि श्रमिक,
परिश्रम का प्रतीक,
मेहनत का वैज्ञानिक,
अनथक दौड़ता जीव ।

चौबीसों घंटे मुशक्कत,
करता कर्म निष्कपट,
चले जाता धर्मपथ,
अद्भुत कला महारत ।

विकास इसीके कारण,
हर समस्या का निवारण,
तन मन करे है अर्पण,
अर्थव्यवस्था का ये दर्पण ।

भरी दोपहरी तपती धूप,
चाहे हो फिर वर्षा खूब,
ये काम में ही मशरूफ़,
है अतुलनीय ये अनूप ।

पसीना बहाके बनाए इमारत,
बांध, सड़क, कारखाने, छत,
पूरी करे हर किसी की चाहत,
इस स्तम्भ के बल पर भारत ।

गर्मी हो या चाहे सर्दी,
ख़ून से अपने सींचे धरती,
आत्मनिर्भर कि आजीविका चलती,
इसके हुनर से छठा बिखरती ।

सागर में जैसे नमक,
उतनी इसकी है चमक,
इसका योगदान आश्चर्यजनक,
इसकी आवश्यकता असीम अनंत ।

बंगले, भवन, राजमहल,
नंगे पाँव, भूखे तन,
किए निर्माण शोभन सृजन,
जो देखे वो रह जाए दंग । 

इसकी मगर है ये बदकिस्मत,
कोयले की खान में हीरे की कद्र,
बेगैरत होता बजाए फ़क्र,  
इसके नहीं जज़्बात या हक ?

मलिन सियासत का ये मोहरा,
इससे धोखा एक ना दोहरा,
ज़ख्म घाव बड़ा ही गहरा,
पानी कब तक बोलो ठहरा !

चक्रव्युह में गया है फंस,
दलदल में है गया धंस,
ना रो सके, ना सके है हंस,
हुआ असहाय, लाचार, बेबस ।

जिससे पूरा शहर खिला,
उसकी वफादारी का यही सिला ?
धरा से लेकर अंबर हिला,
कब थमेगा बागी सिलसिला ?

सीने के टुकड़े को किया है दूर,
चंद नोटों की खातिर हुज़ूर,
ना कोई दोष, ना उसका कुसूर,
मज़दूर नहीं, वो है मजबूर …
मज़दूर नहीं, वो है मजबूर …     (53)

स्वरचित – अभिनव ✍🏻
उभरता कवि आपका “अभी”

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