अभिनव कुमार – छद्म रचनाएँ – 4

बिन मतलब,
गर तेरी तलब,
मानो मिल गया रब,
मिल गया रब ।

अभिनव कुमार

आँखों से बात,
कुछ अलग ही बात,
तारों की रात,
अनकहे जज़्बात ।

अभिनव कुमार

दोस्ती मैं सच्ची निभा ना सका,
दिल में तुम्हारे जगह पा ना सका,
झूठ ना कहके भी झूठा कहलाया,
ग़लती थी बस यही कि हक़ीक़त बता ना सका ।

अभिनव कुमार

आपकी दुआ है, 🙏🏻
सबकुछ तो दिया है, 🛐
मैं पर बेशुक्रा, ☹️
क्या तुमने किया है ? 😠
आत्म-मंथन ✍🏻

अभिनव कुमार

जब लिख जाता हूँ,
मैं मुस्काता हूँ,
लगता है ऐसे,
कि सब पाता हूँ।

अभिनव कुमार

मिल जाए प्रशंसा,
बिल्कुल नहीं मंशा,
लिखता हूँ मैं तो,
करने मन हल्का ।

अभिनव कुमार

मैं एक आम आदमी हूँ,
आंखों में सिर्फ़ नमी हूँ,
इच्छाएं जो बस दबी हूँ,
केवल कमी ही कमी हूँ ।

अभिनव कुमार
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महज़ एक दोस्त नहीं बना पाया,
सब बेकार, कुछ भी ना कमाया,
फ़िर क्या तात्पर्य धूप या छाया !
क्या साझा, क्या ही था छुपाया !

अभिनव कुमार

रोता हूँ, तो कहो, बने तमाशा,
पीता हूँ, तो कहो, जाहिल आवारा,
मेरा जीना ना मरना गंवारा,
मुझको जीते जी है मारा ।

अभिनव कुमार

ख़ुद से दूर हुए, हो गए अरसे,
निकला, निकाला गया हूँ घर से ?
आपबीती मेरी कोई तो समझे !
मेरा दिल, बस एक दोस्त को तरसे ।

अभिनव कुमार

आप चट्टान हैं,
नींव हैं,
अपने परिवार की,
रीढ़ हैं ।

धीरज रखिये,
मुस्कान रखिये,
हिफाज़त से संजोके,
अपना ध्यान रखिए ।

प्रार्थी – अभिनव

होंसलों का सबूत देना था,
इसलिए ठोकरें खाकर मुस्कुरा पड़े थे,
वजूद को भी जवाब था देना,
इसलिए उसूल पे हरदम हुए अड़े थे !

अभिनव कुमार

कठिन दौर है, गुज़र जाएगा,
उजाला जल्दी ही आएगा,
तुम बस साहस हिम्मत रखो,
हारेगा वो, जो घबराएगा । ✍🏻

अभिनव कुमार

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