राही – अक्षी त्रिवेदी

नूर का लुत्फ़ उठा रहा राही,
कहीं उसका आदी न हो जाए,
चंचल किरने कर रही सामना,
कहीं वक़्त से मुलाक़ात न हों जाए।

सत्य की गंगा बहते बहते,

कहीं मन का अकस न दिखा जाए,
हो रहा कड़वे सच से सामना,
कही ज़हन में ज़हर न भर जाए।

चाँद को देख मन हो रहा विचलित,
कही वो गुमराह न हो जाए,
सुंदरता अप्सरा सी है धारण,
कहीं सबके मोहताज न बन जाए।

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