कविता

मेरी गलतियों के कारण मैंने उसको खो लिया।

मेरी गलतियों के कारण मैंने उसको खो लिया।

हम दोनों के दरमियान बेपनाह प्यार था।
दोनों को एक दूजे पर बहुत एतबार था।
हर रोज लड़ते थे हम एक दूजे से बहुत।
लेकिन एक दूजे का साथ स्वीकार था।

एक दूजे को देखे बिना रह नहीं सकते थे।
दोनों एक पल की दूरी सह नहीं सकते थे।
हम दोनों एक दूजे के लिए सब कुछ थे।
सोचा था कभी हम बिछड़ नहीं सकते थे।

हाथ थाम लिया था उसका अपने हाथ में।
बस अच्छा लगता था सिर्फ़ उसके साथ में।
इतना हक़ था हम दोनों का एक दूजे पर।
कि नींद खुलते कॉल करते थे आधी रात में।

हम एक दूजे को बस अपना मान चुके थे।
सच होगा हर सपना बस ये जान चुके थे।
कितना प्यार था हम दोनों के बीच नहीं पता।
लेकिन एक दूजे की धड़कन पहचान चुके थे।

हर रोज हम दोनों दिल की बात करते थे।
लोगों से चोरी छिपकर मुलाकात करते थे।
वक़्त का हमको पता ही नहीं रहता था।
बातें सुबह से दिन, दिन से रात करते थे।

फिर एक दिन

उसका रिश्ता तय कर दिया उसके परिवार ने।
न जाने किसकी नज़र लगी दोनों के प्यार में।
दोनों खोए रहे एक दूजे की मोहब्ब्त में हर पल।
और बैठे रहे उसकी शादी टूटने के इंतजार में।

हमारा प्यार हमारे ख्वाबों के नशे में चूर था।
एक दूजे के बिना रहना हमको नामंजूर था।
लेकिन कब बाजी हाथ से निकली पता नहीं।
शायद यही इश्क़ करने वालों का दस्तूर था।

उसकी शादी की पहली रात दोनों रोए थे।
एक झूठी उम्मीद पर हम दोनों खोए थे।
पूरी रात हमने क्या बात की हमें पता नहीं।
जागते हुए आंसूओं से सारे ख़्वाब धोए थे।

उसकी हाथों की मेहंदी में उसका नाम था।
लेकिन दिल में मेरे लिए ही बस पैगाम था।
आगाज बहुत अच्छा था हमारे इश्क़ का।
लेकिन बहुत ही बुरा इश्क़ का अंजाम था।

अब आंगन में उसकी बारात आ चुकी थी।
वो भी आंसुओं की नदियां बहा चुकी थी।
मैं खड़ा था पागलों सा उसका हाथ पकड़।
आंखों के आगे दिन में रात छा चुकी थी।

उसके कहा मैं हर दर्द तकलीफ सह लूंगी।
तुम्हारे साथ पानी की तरह मैं बह लूंगी।
मुझको ले जाओ अभी अपने साथ तुम।
जैसे रखोगे, जिस हाल में मुझको रह लूंगी।

मैं सोचता ही रहा, उसका हाथ छूट गया।
जन्मों का साथ , बस एक पल में टूट गया।
वो चली गई रोते हुए किसी और के पास।
और मैं खड़ा अंदर ही अंदर बहुत टूट गया।

वो जाने लगी तो, उससे ज्यादा यहां मैं रोया।
पूरी रात लिखता रहा, बिल्कुल न मैं सोया।
अपनी गलती पर, बस पछतावा करता रहा।
समझ नहीं पा रहा, उसको मैंने क्यों खोया।

अब अकेले में तन्हा, उसको याद मैं कर रहा हूँ
उसकी याद में अब, घुट घुट कर मैं मर रहा हूँ।
मेरा क्या होगा आगे, ये तो मुझको पता नहीं।
बस उसकी खुशी की दुआ दिन रात कर रहा हूँ।

बस अब एक ही बात मुझको तड़पाती है।

कि
मेरी गलतियों के कारण मैंने उसको खो दिया।

मेरा नाम संदीप कुमार है। मेरी उम्र 34 वर्ष है। मैं उत्तराखंड के नैनीताल में रहता हूँ। कुमाऊँ यूनिवर्सिटी से स्नाकोत्तर किया है। वर्तमान में पत्रकारिता कर रहा हूँ। शायरी, कविता, व्यंग, गज़ल व कहानियां लिखने का बहुत शौक है। इसलिए अपनी सरल बोलचाल की भाषा में…

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