शुभम शर्मा ‘शंख्यधार’ – छद्म रचनाए – 1

मैं नया सुनाने वाला हूं कविताओं का प्याला हूंरोजगार का नाम नहीं है सीरत से नाकारा हूंअजब गजब यहां रंग हैं छाए इन सब में मैं काला हूंकविता सुनना मेरी दिल से मैं पूरा दिलवाला हूं।शुभम शर्मा 'शंख्यधार' लिखा जो भी है मैंने वो मेरी सौगात

“छ: वाणी”

"छ: वाणी" छ: बोले कोई सुनो हमारीभाड़ में जाए दुनिया सारी गोल गोल लोग मुझे घुमातेउल्टा लटकाकर नौ बतातेक्रिकेट में मुझको सिक्स बतातेविक्स एड में मुझे दिखाते। घड़ी है जब भी छ: बजाएदोनों सुइयां सीध पे आएंडूब तब झटपट सूरज जाएकाम छोड़

मैं नहाया नहीं पिछले रविवार से

मैं नहाया नहीं पिछले रविवार से भिं भिना कर उड़ गई है मक्खी मेरे कान सेहूं नहाया मैं नहीं पिछले रविवार से।है मल्लिचछी पन नहीं मेरे जी और जान मेंवो तो बस यूं ही निकल गए पिछले कुछ दिन शान में। थी लगाई ये शर्त मैंने अपने यार सेहै

वो नाराज़ हैं!

वो नाराज़ हैं! मैंने खुद ही खुदको तोड़करअपने रास्ते में कांटे बिछाए हैं,मुझे गिला नहीं है गैरों सेमैंने खुदही खुदसे धोखे खाए हैं। वो देखते हैं तिरछी नजर से मुझे इसमें मेरा क्या कसूर,शायद उन्होंने ऐसे ही हमसे मिलने के गुर अपनाए हैं।

हमारी भाषा : हिंग्लिश

हमारी भाषा : हिंग्लिश(भाषा पर व्यंग कसती एक लघु कथा) मैं अपने मित्रमंडली में अपनी बात को अन्य मित्रो के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करते हुए कहता हूं कि "आदरणीय महानुभावों, आपसे विनती करते हुए इतना कहता चाहता हूं कि जो आप सबने मिलकर

जीवन या कहर

जीवन या कहर ये काली घटा कांटों का महलये जीवन है या कोई कहरटूटा है बनके पहरा यूंजैसे पी लिया हो कोई जहर क्यों मंदम हवा है वहकी सीऔर वीरानगी भी चहेंकी सीपीतल का निकला हर वो महलजिसे सोचा स्वर्ण महल हमने कहीं दूर से आती एक आवाज़जहां

आसमान के तारे

आसमान के तारे टिमटिमाते हैं रात भर तारे आसमान के,मन को हैं बहलाते वो सारे जहान के,जब देखता हूं मैं उन्हें यही सोचता हरदम,हैं क्यों वहां वो रातभर ऐसे ही खड़े। देखा जो मैंने गौर से कुछ कहने वो लगे,ऐसा लगा जैसे वो हों किसी गोद में

कुछ शेर ‘उन’ के नाम

कुछ शेर 'उन' के नाम लहरों के यूं ही किनारे खुल गएसुना है उनको बागी हमारे मिल गए,ये उफनती हुई लहरें खामोश भी होंगीहमको भी कुछ नए सहारे मिल गए। वो अब नहीं पूछा करते हैं हमें अक्सर अपनी बातों मेंकई मुद्दत के लिखे खत उन्हें हमारे मिल

टिप टिप टिप टिप बूंदे

टिप टिप टिप टिप बूंदेटिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरमन में कौंधा सा हुआ मेघ घिरे घनघोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरपढ़ा लिखना ताक धर हो गए भाव विभोर। टिप टिप टिप टिप बूंदे ये मचा रही हैं शोरधक धक कर दिल झूमता

मैं…ख्वाब…और जाम !

मैं…ख्वाब…और जाम ! चाहत की है बात नहींमैंने सब यूं ही छोड़ दियाकैसे तेरे पास रुकूंवेवजह कुछ करना छोड़ दिया जब जब मैं जाता राह अटकमैंने चांद निहारा सुबह तलकसब ख्वाब हैं मेरे चुभन भरेये जानके सबको तोड़ दिया टूटे ख्वाबों को मज़ार

कर्मठ बनो

कर्मठ बनो भूलना भूल जाओ सूली पर झूल जाओ,दिन देखो ना रात अभी आंखों में तुम खून लाओ,हरा भरा होगा सब जीवन बीज तुम्हारे अंदर है,चेहरा और चमन चमकेगा एक बार बस खिल जाओ। संघर्ष करो दृणता लाओ अपना घर आंगन महकाओ,जैसे रस्सी काटे पत्थर ऐसे

शुभम शर्मा ‘शंख्यधार’ – छद्म रचनाएँ

मैं आसमां और तू जमीं (शायरी)बड़ी लंबी नहीं है डोर जो है तेरी मेरीमैं आसमां तेरा तू है जमीं मेरीजब जब महसूस करता हूं करीब से खुद कोतेरी खुशबू से महकती है हर सांस ये मेरी।शुभम शर्मा 'शंख्यधार' तुम मेरा आईनाहर धड़कन धड़कती है तुमसे,हम जान

हम – कविता

हम चाय के शौकीन हमधुन में अपनी लीन हमजब लगेगी अपनी किस्मतहोंगे तब रंगीन हम छा रहा है बादलों काहल्का सा पहरा यहांहो चला सबकुछ धुआं साअब है आती नींद कम।

बस अभी अभी तो

बस अभी अभी तो…. अभी सूरज ढलाअभी चांद आ गयारात आंखों में थीमैं बोतल में आ गया अभी थे तारे खिलेअभी प्रभात आ गयाअभी बस आंख खुली किजुवां पे उसका नाम आ गया शुभम शर्मा 'शंख्यधार'

दादी कहानी सुनाओ ना !!

दादी कहानी सुनाओ ना !! दादी मां दादी मां कहानी एक सुनाओराजा रानी घोड़ा गाड़ी की बातें बतलाओआवाज तुम्हारी है मीठी मन को मेरे भाती हैहर बार नई कहानी दादी आप कहां से लाती हैं? हल्के से मुस्काके बोलीं दादी प्यार जाता के बोलींचिल्लम

मैं नई दुनिया निर्माण करूंगा

मैं नई दुनिया निर्माण करूंगा नहीं चाहिए कोई विरासत ना धर्म और न कोई आफतचारों तरफ मचा कोलाहल मैं इसमें शांति बहाल करूंगामैं नई दुनिया निर्माण करूंगा…. बच्चा बच्चा होता सच्चा जो पका नहीं वो होता कच्चाक्या है जीवन क्या उद्देश्य मैं इसकी

रवि के पास – शुभम शर्मा

रवि के पास… (रवि अर्थात सूर्य) सर्द सासें ओला बनके हैं जहन में बह रहींमन की गर्मी बाजुओं में बौखलाहट कर रहीरुक चुकी बहती पवन अब तो बस हिमपात हैले चलो मुझको वहां तुम जो रवि के पास है….. शांत मन है जोश उत्तम हृदय में आघात हैहै मजे में
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